नंदी दुग्गल की पैदाईश पहेली नवंबर १९३२ को रावलपिंडी (पाकिस्तान) में हुई। स्कुल ५ साल की उम्र में कोयटा, बलूचिस्तान में शुरू हुआ। बड़े अर्थक्वेक(१९३७) के बाद। पिता आर्मी में नौकरी करते थे और हर तीन साल के बाद बदली हो जाता था। मैंने पढाई की दिल्ली , शिमला १९३९ से १९४३। वहाँ से पटना गए और मिल्लर हाई स्कूल हाई कोर्ट के पास है वहाँ १९४७ तक पड़े फिर १९४७ से लाहौर चले गए थे और विभाजन के समय हिंदुस्तान वापस आ गये। और देहरादून में सेंट जोसफ अकादमी में पढ़े और उसके बाद डी. ए. वी कॉलेज। १९५१ में मुंबई आ गए वालिद के साथ।

जैसे के हर नौजवान को फिल्मों का शौक होता है, मैंने भी फिल्म इंडस्ट्री में काम ढूंढना शुरू किया। एक साल के करीब मैंने बलवंत भट और नानाभाई भट(आलिया भट्ट के दादाजी) जैसे महशूर फिल्म डायरेक्टर के साथ चंदू स्टूडियो, कलिना में काम किया। उन दिनों फिल्म इंडस्ट्री व्यवस्थित नहीं थी। और जैसे तैसे कुछ करते रहे। १९५५ में एकइंग्लिश स्टेज शो आया , लेकिन देख ना सका। क्योंकि सब टिकट पहले ही बिक गयी थी। दिल में ये ख़याल आया के बाहर के लोग हिंदुस्तान में आकर हाउसफुल लें सकते हैं तो हमारे कलाकार क्यों नहीं यहाँ से दूसरे मुल्कों में जा सकते हैं , जहाँ हिंदुस्तानी रहते हैं। ये दिमाग में घुस गया और सोचता था के कैसे होगा? मैं फिल्म इंडस्ट्री में काफी लोगों को जानता था। लेकिन काम नहीं मिलता था। राजेंद्र कुमार एक्टर भी इसी चंदू स्टूडियो में आते थे। और इनको १९५४ के करीब चांस मिल गया एक्टिंग का। अफ्रीका से एक शक्स श्री. क्रिशन गाँधी हिंदुस्तान आए और जब उनसे बात हुई तो उन्होंने भी यही कहा। ईस्ट अफ्रीका में बहुत हिंदुस्तानी रहते हैं। क्यों ना यहाँ से कलाकारों को लेके शो किये जाएँ। हम दोनों के ख़यालात मिल गए और पार्टनर बन गए। वो वहाँ सब इंतज़ाम करेंगे और मैं यहाँ कलाकारों का ग्रुप बनाऊंगा। १० महीने लग गए और पहला ग्रुप था तलत महमूद, सी. एच. आत्मा , वैन शिप्ले प्रसिद्ध गिटार प्लेयर और एनोक डेनियलस, एक जीनियस एकॉर्डियन और पियानो वादक साल १९५६ में। तलत साहब उस वक़्त सबसे महशूर प्लेबैक सिंगर थे। ४४ हाउसफुल शो किये और कुछ प्राइवेट भी। कमाने का ख़याल नहीं था,लेकिन कामयाब होने का ख़याल ज़रूर था। आप यकीन नहीं करेंगे कि शो के दाम ५ शिलिंग , ७ शिलिंग और १० शिलिंग रखा था जो बहुत कम था। हमारे हाउसफुल एक ही दिन में हो जाते थे। सबसे मुश्किल काम हिंदुस्तान में उस वक़्त इन कलाकारों का पासपोर्ट बनवाना था। जो के एक जहनुम से कम नहीं था। उस वक़्त बहुत ही कठिनाईयाँ होती थी बाहर जाने के लिए।

एक एंटरटेनमेंट का नया रास्ता खुल गया हिन्दुस्तानियों के लिए जो बाहर के मुल्कों में बस गए थे। ये सिलसिला मेरे साथ ३५ साल तक चलता रहा। और मैंने केनिया, युगांडा, तंज़ानिया, ज़ज़ीबार, यूनाइटेड किंगडम, यु. एस. ए., त्रिनिदाद, गयाना,(वेस्ट इंडीज) सूरीनाम, हॉलैंड, मॉरिशियस, फिजी आइलैंडस, दक्षिण अफ्रीका, बार बार कलाकारों का शो करता रहा। और कलाकार थे रफ़ी साहेब, तलत साहेब, सी. एच. आत्मा, मन्ना डे , हेमंत कुमार, मुकेश जी, किशोर कुमार, कविता जी , अनुराधा जी, और कई दूसरे कलाकार।

किशोर कुमार को हासिल करने के लिए २ साल से ज़्यादा लग गए। उन्होंने कभी भी पब्लिक स्टेज शो नहीं किया था। जब भी मुझे देखते अपना सर हिला देते और नहीं कहते थे कुछ भी। आखिर शायद तंग आकर एक दिन कहा नंदी बोलो क्या कहना चाहते हो ? मैंने पूरा समझाया और कुछ रोज़ के बाद मन्ना डे और हेमंत डा जिनके शो में पहिले २ दफा कर चूका था उनसे मेरे बारे में पूछने के बाद हाँ कर दी। और इस तरह किशोर कुमार का पहिला शो वेस्ट इंडीज , त्रिनिदाद में हुआ। उन दिनों में उनके आराधना फिल्म के गाने रिकॉर्ड हो कर निकले थे। बस उसके बाद हंगामा हो गया और एक के बाद एक शो होने लगे। टोटल मैंने १३६५ शो अपनी ज़िन्दगी में किये हैं। जिनमे १००० से ज्यादा दूसरे मुल्कों में थे। हम लोग हफ्ते में ५ शो करते थे सब जगह लेकिन यू.के., यु. एस. ए., कनाडा में सिर्फ ३ शो हफ़्ते में होते थे। आपको जानकार हैरानी होगी कि त्रिनिदाद में १९६४ में जब मैं हेमंत कुमार का शो लेके गया उस वक़्त त्रिनिदाद में १६९ हिंदुस्तानी बैंड थे। बहुत बड़े कम्पटीशन होते थे लाखों रुपयों के इनाम दिए जाते थे। आज भी वैसेही है। हिंदुस्तान से २०० साल पहिले गए थे सिर्फ अंग्रेजी ही बोलते थे। सूरीनाम में हिंदी भी बोल सकते हैं। उनकी वहाँ की ज़ुबान डच(हॉलैंड की ज़ुबान) है। हिंदुस्तान में शो करना एक के बाद एक, बहुत मुश्किल होता है। सबसे बड़ी समस्या है एंटरटेनमेंट टैक्स। जो हालत हिंदुस्तान में ख़राब होती है वो बताई नहीं जा सकती। कोई सरकार का बड़ा आदमी शो बंद करवा सकता है , जब वो चाहे। लेकिन बाहर मुल्कों में ऐसा नहीं है। वहाँ बड़ी आसानी से शो किये जा सकते हैं। हिंदुस्तान में सिर्फ महाराष्ट्र ही ऐसा प्रांत है जहाँ एंटरटेनमेंट टैक्स १९६१ में हटाया गया था। इसलिए यहाँ हर जगह शो होते ही रहते है।

१९८८ के पास मेरी सेहद में ख़राबी आने लगी। और मैंने शो बंद कर दिए। मैंने २ ऐसे स्टूडियो खोले कि कोई भी वहाँ आकर गा सकता था। बहुत ही सस्ते खर्चे में गानों के संगीत ट्रैक १९८८ में बनाये। और नए कलाकारों को एक उम्मीद हो गयी कि वो भी गा सकते हैं। लोग इतने खुश थे मुझे खाना खाने की फुरसत नहीं मिलती थी। हमारे पास अच्छे रिकार्डिस्ट भी थे और में इन लोगों को गाने की समस्या बताता था। और उनको पार कैसे करना।

मेरा शोज़ का तजुर्बा उनके काम आता था क्योंकि मैंने तो सब बड़े कलाकारों के सैकड़ों शो देखे और कंडक्ट किये। १९९७ में एक और स्टूडियो जोड़ दिया। मैंने एक छोटीसी फिल्म 'ज़ख़्मी रूह' में संगीत दिया है। पहले मैं शोबिज इंटरप्राइज़ेस एंड स्टूडियोज़ के नाम से स्टूडियो चलाता था। लेकिन अब २०१७ में बंद कर दिया है। उम्र ज़्यादा होने की वजह से मैं अपनी सक्रिय ज़िन्दगी से हट चूका था। लेकिन मन ही मन में बार बार ये विचार आता था जो विद्या भगवान ने मुझे दी है, वो मैं जनता को दूँ और उनको समझाऊँ, कैसे अच्छे गायक बन सकते हैं। इसलिए मैंने सोचा कि 'ऑनलाइन शिक्षा'(आपके कंप्यूटर) देनी चाहिए। हमने ६ वीडियो बनाये हैं जिसमें आपकी सब समस्या का समाधान मिलेगा। ये वीडियो प्रोग्राम कोई ढाई घंटे का है। और आप पहले वीडियो को पैसा भरने के वक़्त फॉरेन देख सकते हैं दूसरा, तीसरा,चौथा,पांचवा और छठा वीडियो चार चार दिन के बाद देख सकते हैं। ये इसलिए कि आप दूसरा पाठ खोलना से पहले थोड़ा रियाज़ तो कर लें। गाना बहुत आसान है। कोई भी गा सकता है।बताने वाला चाहिए।इस कोर्स की कीमत ६ हज़ार रुपए है।जो के ख़र्चों को पूरा करने के लिए ज़रूरी है।आपको पैसा भरने की सारी जानकारी अलग से दी जाएगी। (चेक एनरोलमेंट फॉर्म)

स्टूडियो चलाते हुए हमे सबकी कमज़ोरियों का पता लगा। जैसे १) गाते हुए सांस का फूल जाना , २) ताल से हट जाना , ३) सुर को ना लगा पाना और बेसुरा हो जाना , ४) गला सुख जाना , ५) बेचैन हो जाना और इतने साल सीखने के बाद भी ठीक से ना गा पाना।

नाक का उपयोग कैसे करना और कैसे हर गाने में काम आता है। इन सबको समज करके गाना गाना बिलकुल आसान हो जाता है। मुझे कई बरस लग गए इस प्रणाली को बनाने में , कोई किताब नहीं है और कोई समझाता भी नहीं है, कि हमारा जिस्म कैसे चलता है ? गाना तो जिस्म में गाना है,उसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी जाती।ये सब बातें आपको समझायी जायेंगी और ४ हफ्ते में आप कोयल की तरह गाने लग जायेंगें। इन बड़े कलाकारों के शो देखने से समझ में पड़ा कि जिस्म को कैसे गाने में इस्तेमाल किया जाता है। अगर वो कलाकार गा सकते हैं तो आप क्यों नहीं ? हर कोई जो चिल्लाना, बोलना जानता है - गा भी सकता हैं। आप भी महान बन सकते हैं। आज मुंबई के स्टेज पर हर हफ्ते मेरे २५ शागिर्द पेशेवर शोज़ करते हैं,शो होते ही रहते हैं। और चार पैसे भी मिल जाते हैं। शौक भी पूरा हो जाता है अपनी इबादत भी हो जाती है। संगीत एक ऐसी इबादत है जिसे हर कोई गाना चाहता है और जानना चाहता है। किसी डॉक्टर ने आपको को गाना गाने के लिए नहीं कहा है। ये आपकी रूह की आवाज है। आपने कुछ वीडियोस मेरे छात्रों के देखे होंगे।

मुझे खुद गाने का शौक है। मेरी चार एल्बम निकली थीं। ऑटम शैडोस-एच. एम. वी.,गिले शिकवे-सी. बी. एस., हिटस ऑफ़ सी.एच.आत्मा-सी. बी. एस.। “चक्र समय का” भजनों के सारे गाने रेडियो स्टेशनस को भेजे जा चुकें हैं। आप इन गानों को इंटरनेट पर सुन सकते हैं।“चक्र समय का”, गानों का संगीत ट्रक भी दिया गया है जो आप गा सकते हैं।आप इंटरनेट पर जाकर आल सांग्स ऑफ़ नंदी दुग्गल डालें या एल्बम का नाम दें तो आपको ४० गाने सुनिए और उन गानों का आनंद लें। कोई ५ साल पहले मेरे गले का ऑपरेशन हुआ था। इसके बाद मेरी आवाज़ ख़राब हो गयी। कुछ ना कर पाया।आप मेरी बहुत स्पष्ट आवाज़ नहीं सुन सकेंगे। आपको सब समझ आ जायेगा। मेरे गानों का नमूना भी आपको सुनाऊँगा,एक वीडियो में।इन महान कलाकारों के शो में गाने का मौका कभी कभी मुझे भी मिल जाता था जब इनकी आवाज़ कभी ख़राब होती थी,तो २० मिनट के लिए मुझे भी गाने का मौका मिलता था।बहुत पुराने गाने सहगल साहिब के और पंकज मलिक साहिब के गाने गाता था। शो बंद नहीं होगा। इसको चलना ही होगा - और हमेशा चला।

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